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Bollywood star Vinod Khanna biography in Hindi
Vinod Khanna Biography in Hindi: बॉलीवुड के इतिहास में कई बड़े-बड़े सुपरस्टार्स आए, लेकिन विनोद खन्ना जैसा कोई दूसरा नहीं हुआ। 6 फीट लंबा कड़क कद, चेहरे पर मर्दाना रोब, और ऐसी शानदार एक्टिंग कि जब वे पर्दे पर आते थे, तो अच्छे-अच्छे विलेन और हीरो के पसीने छूट जाते थे। वे इकलौते ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को उनके सबसे बेहतरीन दौर में कड़ी टक्कर दी थी।
लेकिन विनोद खन्ना सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता नहीं थे; वे एक ऐसे रहस्यमयी इंसान थे जो अपने करियर के शिखर पर होते हुए, जब वे सबसे ज्यादा पैसे कमा रहे थे, सब कुछ छोड़कर एक संन्यासी बन गए। आइए जानते हैं विनोद खन्ना के बचपन, उनके विलेन से हीरो बनने के सफर, ओशो के आश्रम की कहानी और उनकी पर्सनल लाइफ का पूरा इतिहास।
👶 1. शुरुआती जीवन और बंटवारे का दर्द (Early Life & Background)
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को अविभाजित भारत के पेशेवर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। वे एक संपन्न पंजाबी परिवार से ताल्लुक रखते थे।
पिता का नाम: किशोरीलाल खन्ना (वे कपड़ों और रसायनों के बहुत बड़े बिजनेसमैन थे)।
माता का नाम: कमला खन्ना (एक घरेलू महिला थीं)।
भाई-बहन: विनोद खन्ना के अलावा उनके परिवार में तीन बहनें और एक भाई (प्रमोद खन्ना) थे।
🏙️ विभाजन के बाद मुंबई आगमन:
साल 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ, तो विनोद खन्ना का परिवार पाकिस्तान से सब कुछ छोड़कर पहले दिल्ली आया और फिर हमेशा के लिए मुंबई (तब बॉम्बे) आकर बस गया। विनोद खन्ना ने अपनी शुरुआती पढ़ाई सेंट जेवियर्स हाई स्कूल, मुंबई से की। इसके बाद उनके पिता ने उन्हें दिल्ली के पास द लॉरेंस स्कूल, सनावर (बोर्डिंग स्कूल) भेज दिया। कॉलेज की पढ़ाई उन्होंने मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज से कॉमर्स (Commerce) में पूरी की।
🎭 2. विलेन के रूप में शुरुआत और पिता की धमकी (The Entry into Bollywood)
विनोद खन्ना के पिता चाहते थे कि उनका बड़ा बेटा पढ़ाई पूरी करके उनके करोड़ों के बिजनेस को संभाले। लेकिन कॉलेज के दिनों में विनोद खन्ना को थिएटर और नाटकों का चस्का लग गया था।
पिता की कड़क शर्त: जब विनोद खन्ना ने अपने पिता से कहा कि वे फिल्मों में जाना चाहते हैं, तो उनके पिता बेहद नाराज हुए। उन्होंने विनोद खन्ना पर बंदूक तान दी थी और कहा था कि अगर तुम फिल्मों में गए तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगा। हालांकि, बाद में माँ के समझाने पर उनके पिता ने उन्हें सिर्फ 2 साल का समय दिया और कहा कि अगर 2 साल में कुछ नहीं कर पाए, तो वापस आकर बिजनेस संभालना होगा।
🎬 पहली फिल्म 'मन का मीत' (1968):
मशहूर अभिनेता और निर्माता सुनील दत्त ने विनोद खन्ना के कड़क लुक को देखा और उन्हें साल 1968 में अपनी फिल्म 'मन का मीत' में बतौर विलेन (खलनायक) लॉन्च किया।
नतीजा: फिल्म के हीरो तो कोई और थे, लेकिन लोग सिनेमा हॉल से बाहर निकलते समय सिर्फ विलेन विनोद खन्ना की तारीफ कर रहे थे। इसके बाद विनोद खन्ना ने 'पूरब और पश्चिम', 'आन मिलो सजना' और 'मेरा गांव मेरा देश' जैसी कई फिल्मों में खतरनाक विलेन के रोल किए और खूब नाम कमाया।
🚀 3. विलेन से 'रोमांटिक हीरो' और अमिताभ बच्चन से टक्कर (The Golden Era)
बॉलीवुड का एक नियम रहा है कि जो एक बार विलेन बन गया, उसे हीरो का रोल नहीं मिलता। लेकिन विनोद खन्ना ने इस नियम को तोड़ दिया। साल 1971 में आई फिल्म 'हम तुम और वो' में वे पहली बार मुख्य हीरो के रूप में नजर आए।
इसके बाद गुलजार साहब की फिल्म 'मेरे अपने' (1971) ने विनोद खन्ना को एक संजीदा और कड़क हीरो के रूप में स्थापित कर दिया। 70 के दशक में विनोद खन्ना बॉलीवुड के सबसे महंगे और पसंदीदा हीरोज में से एक बन चुके थे।
🔥 अमिताभ बच्चन बनाम विनोद खन्ना:
70 के दशक में जहाँ एक तरफ अमिताभ बच्चन 'एंग्री यंग मैन' बनकर राज कर रहे थे, वहीं इकलौते विनोद खन्ना ऐसे थे जो अमिताभ को कड़ी टक्कर दे रहे थे। इन दोनों ने एक साथ कई ब्लॉकबस्टर फिल्में कीं:
हेरा फेरी (1976)
खून पसीना (1977)
अमर अकबर एंथनी (1977) (इस फिल्म में विनोद खन्ना ने सबसे बड़े भाई अमर यानी कड़क पुलिस वाले का रोल किया था)
मुकद्दर का सिकंदर (1978)
फिल्मी पंडितों का मानना था कि विनोद खन्ना की लोकप्रियता उस समय अमिताभ बच्चन से भी ज्यादा बढ़ रही थी और वे बहुत जल्द बॉलीवुड के नंबर-1 सुपरस्टार बनने वाले थे।
🧘 4. ओशो की शरण और सब कुछ छोड़ संन्यासी बनना (The Shocking Decision - 1982)
साल 1982 में जब विनोद खन्ना अपने करियर के सबसे ऊंचे शिखर पर थे, उनके पास पैसों और फिल्मों की कोई कमी नहीं थी, तब उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरे बॉलीवुड और उनके प्रशंसकों को हिलाकर रख दिया।
🍂 संन्यास का कारण:
विनोद खन्ना अपनी माँ की अचानक हुई मौत से बहुत टूट चुके थे। उन्हें इस चकाचौंध की दुनिया में शांति नहीं मिल रही थी। वे आध्यात्मिक गुरु ओशो (भगवान श्री रजनीश) के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी चमचमाती गाड़ियां, करोड़ों के बंगले, फिल्में और यहाँ तक कि अपने हँसते-खेलते परिवार (पत्नी गीतांजलि और बेटों राहुल व अक्षय खन्ना) को भी छोड़ दिया।
अमेरिका में ओशो के आश्रम में माली का काम: विनोद खन्ना ओशो के साथ अमेरिका के ओरेगन स्थित आश्रम (रजनीशपुरम) चले गए। वहाँ इस सुपरस्टार ने पूरे 5 साल तक एक साधारण संन्यासी की तरह जिंदगी बिताई। वे आश्रम के बगीचे में पौधों को पानी देते थे, माली का काम करते थे और ओशो के बर्तन व टॉयलेट तक साफ करते थे। उन्हें वहाँ 'स्वामी विनोद भारती' नाम दिया गया था।
🔙 5. बॉलीवुड में दूसरी पारी और शानदार वापसी (The Comeback - 1987)
5 साल अमेरिका में रहने के बाद जब ओशो का आश्रम बंद हुआ, तो विनोद खन्ना साल 1987 में वापस भारत लौटे। लेकिन तब तक बहुत कुछ बदल चुका था। उनकी पहली पत्नी गीतांजलि ने उन्हें तलाक दे दिया था और उनके पैसे भी लगभग खत्म हो चुके थे।
💥 धमाकेदार वापसी:
विनोद खन्ना ने फिल्म 'इंसाफ' (1987) से डिंपल कपाड़िया के साथ बॉलीवुड में दोबारा वापसी की। दर्शकों ने अपने चहेते स्टार का वैसा ही कड़क स्वागत किया और यह फिल्म सुपरहिट रही। इसके बाद उन्होंने:
दexternal दयावान (1988): इस फिल्म में उनका निभाया गया 'शक्ति वेलु' (डॉन) का किरदार आज भी मील का पत्थर माना जाता है।
चांदनी (1989): ऋषि कपूर और श्रीदेवी के साथ इस फिल्म में उनके मैच्योर रोमांटिक रोल को खूब पसंद किया गया।
उम्र बढ़ने के साथ उन्होंने कई फिल्मों में कड़क पिता और बुजुर्ग के रोल भी निभाए, जैसे सलमान खान की फिल्म 'दबंग' में उनके पिता प्रजापति पांडे का किरदार और शाहरुख खान की फिल्म 'दिलवाले' (2015)।
🏛️ 6. राजनीति का सफर (The Political Career)
विनोद खन्ना सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं रहे। साल 1997 में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए।
वे पंजाब की गुरदासपुर सीट से लगातार 4 बार लोकसभा सांसद चुने गए।
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में वे भारत के केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री और बाद में विदेश राज्य मंत्री भी बने। उन्होंने राजनेता के रूप में अपने क्षेत्र पंजाब में बहुत से विकास कार्य किए।
💔 7. व्यक्तिगत जीवन और दो शादियाँ (Personal Life & Marriages)
विनोद खन्ना की पर्सनल लाइफ काफी उतार-चढ़ाव से भरी रही:
पहली शादी (गीतांजलि खन्ना - 1971): कॉलेज के दिनों की दोस्त गीतांजलि से उन्होंने शादी की। इनसे उनके दो बेटे हुए—राहुल खन्ना और अक्षय खन्ना। ओशो के आश्रम जाने की वजह से साल 1985 में इनका तलाक हो गया।
दूसरी शादी (कविता खन्ना - 1990): भारत लौटने के बाद विनोद खन्ना ने साल 1990 में कविता से शादी की। इनसे उनका एक बेटा साक्षी खन्ना और एक बेटी श्रद्धा खन्ना हैं।
🎗️ 8. अंतिम समय और विदाई (The Last Journey - 2017)
साल 2017 की शुरुआत में विनोद खन्ना को ब्लाडर कैंसर (Bladder Cancer) का पता चला। उनकी एक अस्पताल की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी जिसमें वे बेहद कमजोर दिख रहे थे, जिसे देखकर उनके फैंस की आँखें नम हो गई थीं।
27 अप्रैल 2017 को 70 वर्ष की आयु में मुंबई के सर एच.एन. रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में इस महानायक ने आखिरी सांस ली।
उनकी मृत्यु के बाद, साल 2018 में भारत सरकार ने उन्हें सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान "दादा साहब फाल्के पुरस्कार" (मरणोपरांत) से सम्मानित किया।
📌 9. निष्कर्ष (Conclusion)
विनोद खन्ना बॉलीवुड के इतिहास के इकलौते ऐसे 'फकीर राजा' थे, जिन्होंने साबित किया कि शांति और अध्यात्म के सामने दुनिया का बड़े से बड़ा स्टारडम और पैसा भी छोटा है। एक खतरनाक विलेन से लेकर रोमांस के किंग और फिर एक सफल राजनेता बनने तक का उनका सफर हर किसी को प्रेरित करता है। वे आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अमर अकबर एंथनी का 'अमर' और बॉर्डर के 'धरमवीर' के पिता के रूप में वे हमेशा अमर रहेंगे।
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