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परेश रावल का जीवन परिचय: जीवनी, फिल्में, परिवार, नेट वर्थ और राजनीतिक सफर | Paresh Rawal Biography in Hindi
परेश रावल का जीवन परिचय: रंगमंच से बॉलीवुड के 'बाबूराव' बनने तक का सफर (Paresh Rawal Biography in Hindi)
भारतीय सिनेमा जगत में ऐसे बहुत कम अभिनेता हुए हैं, जिन्होंने अपनी वर्सटालिटी (बहुमुखी प्रतिभा) के दम पर दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी हो। एक ऐसा अभिनेता जो पर्दे पर खूंखार खलनायक बनता है, तो लोग खौफ खा जाते हैं; जो गंभीर भूमिका निभाता है, तो आंखें नम कर देता है; और जब वह कॉमेडी पर उतरता है, तो दर्शकों को हंसते-हंसते लोटपोट होने पर मजबूर कर देता है। जी हां, हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के लिविंग लीजेंड परेश रावल की।
'हेरा फेरी' के 'बाबूराव गणपतराव आप्टे' के किरदार से हर पीढ़ी के दिलों में बसने वाले परेश रावल का अभिनय सफर सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने थिएटर (रंगमंच) और राजनीति में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई है। आइए इस लेख में उनके जीवन, संघर्ष, करियर और सफलताओं को विस्तार से जानते हैं।
परेश रावल का संक्षिप्त परिचय (Quick Bio Data)
मुख्य विवरणजानकारी
पूरा नामपरेश रावल
जन्म तिथि30 मई 1955
जन्म स्थानमुंबई, महाराष्ट्र (मूल रूप से अहमदाबाद, गुजरात)
उम्र (2026 में)71 वर्ष
पेशाअभिनेता, थियेटर कलाकार, पूर्व सांसद (MP)
डेब्यू फिल्महोली (1984)
प्रसिद्ध किरदारबाबूराव (हेरा फेरी), कांजी लालजी मेहता (OMG)
राष्ट्रीय पुरस्कारपद्म श्री (2014), नेशनल फिल्म अवार्ड
प्रारंभिक जीवन, जन्म और शिक्षा (Early Life & Education)
परेश रावल का जन्म 30 मई 1955 को मुंबई (तब बॉम्बे) में एक गुजराती ब्राह्मण परिवार में हुआ था। हालांकि उनका जन्म मुंबई में हुआ, लेकिन उनका पैतृक जुड़ाव गुजरात के गांधीनगर जिले के 'पलीआड' गांव से है। उनके पिता का नाम डाह्यालाल रावल था।
मुंबई के माहौल में पले-बढ़े परेश रावल की शुरुआती शिक्षा वहीं से हुई। उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई के विले पार्ले स्थित नरसी मोंजी कॉलेज ऑफ कॉमर्स एंड इकोनॉमिक्स (NM College) में दाखिला लिया। कॉलेज के दिनों से ही उनका झुकाव पढ़ाई से कहीं ज़्यादा अभिनय की तरफ होने लगा था। वे कॉलेज के नाटकों और थिएटर ग्रुप्स में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे थे।
थिएटर से हुई अभिनय की शुरुआत (The Theater Journey)
परेश रावल को अभिनय की बारीकियां सिखाने में गुजराती और हिंदी रंगमंच (Theater) का बहुत बड़ा हाथ रहा है। 1970 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने कई गुजराती नाटकों में काम किया। रंगमंच पर उनकी गंभीर और प्रभावशाली आवाज तथा चेहरे के भावों ने उन्हें जल्द ही थिएटर की दुनिया का एक बड़ा नाम बना दिया।
उनका एक नाटक 'टोक्यो में एक गधा' और बाद के वर्षों में आया 'किशन बनाम कन्हैया' (जिस पर बाद में 'ओएमजी: ओह माय गॉड' फिल्म बनी) बेहद लोकप्रिय हुए। परेश रावल आज भी मानते हैं कि एक अभिनेता के तौर पर उन्हें तराशने का काम थिएटर ने ही किया है, जहाँ रीटेक की कोई गुंजाइश नहीं होती।
फिल्मी करियर की शुरुआत: बतौर खलनायक पहचान (Bollywood Debut as a Villain)
परेश रावल ने साल 1984 में फिल्म 'होली' से बॉलीवुड में कदम रखा। इस फिल्म में उनके साथ आमिर खान ने भी अपने करियर की शुरुआत की थी। हालांकि, इस फिल्म से उन्हें वह पहचान नहीं मिली जिसकी उन्हें तलाश थी।
साल 1986 में आई महेश भट्ट की फिल्म 'नाम' परेश रावल के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने 'राणा' नाम के एक क्रूर खलनायक की भूमिका निभाई। संजय दत्त और कुमार गौरव जैसे सितारों से सजी इस फिल्म में परेश रावल के निगेटिव किरदार को खूब सराहा गया। इसके बाद बॉलीवुड में उनके पास विलेन के किरदारों की लाइन लग गई।
80 और 90 के दशक में उन्होंने कई फिल्मों में क्रूर, चालाक और भ्रष्ट राजनेता या गुंडे की भूमिकाएं निभाईं। इनमें से कुछ प्रमुख फिल्में थीं:
कब्जा (1988)
राम लखन (1989)
किंग अंकल (1993)
दामिनी (1993)
मोहरा (1994)
फिल्म 'दामिनी' में उनके द्वारा निभाया गया क्रूर वकील का किरदार आज भी लोगों के जेहन में जिंदा है।
करियर का नया मोड़: कॉमेडी के बेताज बादशाह (The Comedy Era)
जहां एक तरफ लोग परेश रावल को सिर्फ एक विलेन के रूप में देखने लगे थे, वहीं साल 1994 में आई राजकुमार संतोषी की कल्ट क्लासिक फिल्म 'अंदाज़ अपना अपना' में उन्होंने डबल रोल (तेजा और श्याम गोपाल बजाज) निभाकर सबको चौंका दिया। इस फिल्म में उनका डायलॉग "तेजा मैं हूँ, मार्क इधर है" आज भी मीम्स में इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ से दुनिया ने उनकी कमाल की कॉमिक टाइमिंग देखी।
इसके बाद साल 2000 में प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी फिल्म 'हेरा फेरी' रिलीज हुई। इस फिल्म ने परेश रावल के करियर को हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया।
'बाबूराव गणपतराव आप्टे' का अमर किरदार
'हेरा फेरी' में परेश रावल ने एक चश्मा लगाने वाले, धोती पहनने वाले तुनकमिजाज लेकिन दिल के साफ मराठी मकान मालिक 'बाबूराव' (Baburao) का किरदार निभाया। अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी जैसे बड़े स्टार्स के होने के बावजूद परेश रावल पूरी फिल्म की जान बन गए। उनके बोलने का लहजा, उनके डायलॉग्स जैसे— "ये बाबूराव का स्टाइल है", "खोपड़ी तोड़ साले का"— भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमर हो गए। इस किरदार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। इसके बाद 2006 में आई इसकी सीक्वल 'फिर हेरा फेरी' ने भी सफलता के झंडे गाड़े।
इसके बाद परेश रावल ने कॉमेडी फिल्मों की झड़ी लगा दी:
आवारा पागल दीवाना (2002) - 'मणिलाल' का किरदार
हंगामा (2003) - 'राधेश्याम तिवारी'
हलचल (2004)
गरम मसाला (2005)
मालामाल वीकली (2006) - 'लिलिया'
वेलकम (2007) - 'डॉ. घुंघरू'
भागम भाग (2006)
गंभीर और चरित्र भूमिकाओं में लोहा मनवाया (Serious & Character Roles)
परेश रावल सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने कई ऐसी फिल्में कीं जहाँ उनके अभिनय की गहराई देखकर लोग हैरान रह गए।
सर (1993): इस फिल्म में उन्होंने एक हकलाने वाले विलेन (velji) का किरदार निभाया, जो बेहद चुनौतीपूर्ण था।
तमस (1988) और सरदार (1993): केतन मेहता की बायोपिक फिल्म 'सरदार' में परेश रावल ने भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका निभाई। इस गंभीर किरदार को उन्होंने इतनी शिद्दत से जिया कि समीक्षकों ने इसे उनके करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से एक माना।
ओएमजी - ओह माय गॉड! (2012): इस फिल्म में उन्होंने 'कांजी लालजी मेहता' नाम के एक नास्तिक दुकानदार का किरदार निभाया जो भगवान पर ही केस कर देता है। यह फिल्म न सिर्फ सुपरहिट रही, बल्कि इसने समाज को एक बहुत बड़ा संदेश भी दिया।
संजू (2018): संजय दत्त की इस बायोपिक में उन्होंने सुनील दत्त साहब का किरदार निभाया और पिता-पुत्र के इमोशनल रिश्ते को बखूबी पर्दे पर उतारा।
व्यक्तिगत जीवन, पत्नी और बच्चे (Personal Life & Family)
परेश रावल का पारिवारिक जीवन काफी शांत और विवादों से दूर रहा है। उन्होंने साल 1987 में स्वरूप संपत से शादी की थी। स्वरूप संपत साल 1979 में 'मिस इंडिया' रह चुकी हैं और वे भी एक बेहतरीन अभिनेत्री रही हैं (उन्होंने प्रसिद्ध टीवी शो 'ये जो है जिंदगी' में काम किया था)। स्वरूप संपत शिक्षा के क्षेत्र में भी काफी सक्रिय हैं और बच्चों की शिक्षा को लेकर काम करती हैं।
परेश रावल और स्वरूप संपत के दो बेटे हैं:
आदित्य रावल (Aditya Rawal): आदित्य एक लेखक और अभिनेता हैं। उन्होंने फिल्म 'बमफाड़' से अपने अभिनय की शुरुआत की है।
अनिरुद्ध रावल (Aniruddh Rawal): वे भी सिनेमा और थिएटर के तकनीकी पहलुओं में रुचि रखते हैं और सहायक निर्देशक के रूप में काम कर चुके हैं।
राजनीतिक सफर (Political Career)
अभिनय में अपना परचम लहराने के बाद परेश रावल ने राजनीति का रुख किया। वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के मुखर समर्थक रहे हैं।
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने उन्हें गुजरात की अहमदाबाद पूर्व (Ahmedabad East) सीट से उम्मीदवार बनाया।
उन्होंने भारी मतों से जीत हासिल की और 2014 से 2019 तक लोकसभा सांसद (MP) रहे।
सांसद के रूप में उन्होंने अपने क्षेत्र के विकास के लिए कई काम किए, हालांकि बाद में उन्होंने अपने अभिनय और थिएटर कमिटमेंट्स के कारण 2019 का चुनाव न लड़ने का फैसला किया।
पुरस्कार और सम्मान (Awards and Achievements)
भारतीय सिनेमा और कला में उनके बहुमूल्य योगदान के लिए परेश रावल को देश के कई बड़े नागरिक और फिल्मी सम्मानों से नवाजा जा चुका है:
पद्म श्री (2014): भारत सरकार द्वारा कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Award): साल 1994 में फिल्म 'वह छोकरी' और 'सर' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
फिल्मफेयर पुरस्कार (Filmfare Awards):
सर्वश्रेष्ठ खलनायक (फिल्म 'सर' - 1994)
सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (फिल्म 'हेरा फेरी' - 2001)
सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (फिल्म 'आवारा पागल दीवाना' - 2003)
NSD के अध्यक्ष: सितंबर 2020 में उन्हें भारत के प्रतिष्ठित संस्थान नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) का अध्यक्ष (Chairman) नियुक्त किया गया था।
परेश रावल की कुल संपत्ति (Paresh Rawal Net Worth)
मीडिया रिपोर्ट्स और विभिन्न स्रोतों के अनुसार, परेश रावल की कुल संपत्ति (Net Worth) लगभग 100 से 120 करोड़ रुपये के आसपास आंकी जाती है। उनकी कमाई का मुख्य जरिया फिल्मों में अभिनय, ब्रांड एंडोर्समेंट और उनके खुद के थिएटर प्रोडक्शंस हैं। मुंबई के पॉश इलाके जुहू में उनका एक आलीशान घर है और उनके पास कई लग्जरी गाड़ियां भी हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
परेश रावल केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि अभिनय की एक चलती-फिरती पाठशाला हैं। विलेन के खौफ से लेकर बाबूराव के ठहाकों तक, और सरदार पटेल की गंभीरता से लेकर कांजी भाई की तार्किकता तक, उन्होंने हर किरदार को अमर बना दिया। आज 70 वर्ष से अधिक की उम्र पार करने के बाद भी उनका अभिनय के प्रति जज्बा कम नहीं हुआ है। वे आज भी हर फिल्म में कुछ नया और अनोखा करने का प्रयास करते हैं।
भारतीय सिनेमा में परेश रावल का योगदान हमेशा स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। हमें उम्मीद है कि आने वाले समय में भी वे अपनी बेहतरीन फिल्मों से दर्शकों का मनोरंजन करते रहेंगे।
आपको परेश रावल का कौन सा किरदार सबसे ज्यादा पसंद है? कमेंट करके हमें जरूर बताएं और इस लेख को अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें!
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