प्रदर्शित
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
नाना पाटेकर की जीवनी: उम्र, परिवार, फ़िल्मी सफ़र, पुरस्कार और समाज सेवा | Nana Patekar Biography in Hindi
नाना पाटेकर की जीवनी (Nana Patekar Biography in Hindi)
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ही ऐसे अभिनेता हुए हैं जिन्होंने बिना किसी गॉडफादर, बिना पारंपरिक चॉकलेटी चेहरे और बिना किसी दिखावे के केवल अपनी अभिनय क्षमता और संवाद अदायगी (Dialogue Delivery) के दम पर करोड़ों दर्शकों के दिलों पर राज किया। ऐसे ही अद्वितीय और जुझारू कलाकार का नाम है—विश्वनाथ 'नाना' पाटेकर।
नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं, बल्कि सिनेमा की दुनिया में एक संस्था हैं। उनका बेबाक अंदाज़, आँखों की तीव्रता, चेहरे के सटीक हाव-भाव और डायलॉग बोलने की अनूठी लय भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती है। चाहे 'परिंदा' का खूंखार गैंगस्टर 'अन्ना सेठ' हो, 'क्रांतिवीर' का सिस्टम को ललकारने वाला 'प्रताप', 'खामोशी' का मूक-बधिर लाचार पिता हो या फिर 'वेलकम' का हँसा-हँसाकर लोटपोट कर देने वाला 'उदय शेट्टी'—नाना ने हर किरदार में जान फूँक दी। पर्दे से इतर, वास्तविक जीवन में वे एक संवेदनशील समाजसेवक और भारतीय सेना के प्रति समर्पित देशप्रेमी हैं।
नाना पाटेकर: एक नज़र में (Quick Bio / Wiki Table)
विवरण (Parameter)जानकारी (Details)
पूरा असली नाम (Real Name)विश्वनाथ दिनकर पाटेकर (Vishwanath Dinkar Patekar)
लोकप्रिय नाम (Pet Name)नाना (Nana)
जन्म तिथि (Date of Birth)1 जनवरी 1951
जन्म स्थान (Place of Birth)मुरुड-जंजीरा, रायगढ़, महाराष्ट्र
पेशा (Profession)अभिनेता, लेखक, निर्देशक, समाजसेवक (Philanthropist)
शिक्षा (Education)सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट, मुंबई (कमर्शियल आर्ट डिप्लोमा)
डेब्यू फ़िल्म (Debut Movie)गमन (1978)
निर्देशन डेब्यू (Directorial Debut)प्रहार: द फाइनल अटैक (1991)
पिता का नाम (Father's Name)दिनकर पाटेकर (कपड़ा व्यापारी)
माता का नाम (Mother's Name)संजनाबाई पाटेकर / निर्मला पाटेकर
पत्नी (Wife)नीलकंठी पाटेकर (पूर्व बैंक अधिकारी, रंगमंच कलाकार)
संतान (Children)मल्हार पाटेकर (पुत्र)
राष्ट्रीय सम्मान (Civilian Honor)पद्म श्री (2013)
प्रारंभिक जीवन और संघर्ष: जब जेब में पैसे नहीं थे और भूख साथी थी
नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के तटीय कस्बे मुरुड-जंजीरा के एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता दिनकर पाटेकर मुंबई में एक छोटा-मोटा कपड़े का छपाई का व्यापार करते थे, जबकि माँ गृहिणी थीं।
नाना का बचपन खुशहाली में बीता, लेकिन जब वे महज़ 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता के एक करीबी परिचित ने व्यापार में बड़ा धोखा दिया। परिवार रातों-रात कंगाल हो गया। घर की आर्थिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो गया।
परिवार की मदद के लिए किशोर नाना ने अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मजदूरी और छोटे-मोटे काम करना शुरू किया:
वे सड़कों पर फ़िल्मों के पोस्टर चिपकाने और जेब्रा क्रॉसिंग पेंट करने का काम करते थे।
इसके बदले उन्हें रोज़ाना मात्र 35 रुपये और दिन में एक वक्त का सादा भोजन मिलता था।
मीलों पैदल चलकर वे काम पर जाते थे ताकि लोकल ट्रेन और बस का किराया बच सके।
इन्हीं कठिन संघर्षों ने नाना के भीतर ज़िंदगी की वास्तविक पीड़ा और सामाजिक असमानता की समझ पैदा की। कला के प्रति उनकी स्वाभाविक रुचि थी, इसलिए उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध सर जे. जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट (Sir J.J. Institute of Applied Art) में दाखिला लिया और कमर्शियल आर्ट में डिप्लोमा पूरा किया। इसके बाद उन्होंने कुछ समय तक एडवरटाइजिंग एजेंसी 'स्ट्रोनैक्स' में विज़ुअलाइज़र के रूप में भी नौकरी की।
थिएटर से फ़िल्मी दुनिया का सफ़र
नाना पाटेकर की अभिनय प्रतिभा को सबसे पहले मराठी रंगमंच (Marathi Theatre) ने तराशा। उन्होंने 1970 के दशक में मुंबई के प्रायोगिक और व्यावसायिक नाटकों में भाग लेना शुरू किया। नाटकों के मंच पर नाना की आवाज़ की गूंज और स्वाभाविक ऊर्जा को देखकर निर्देशक मुजफ्फर अली बेहद प्रभावित हुए।
1978 में मुजफ्फर अली ने अपनी समीक्षकों द्वारा सराही गई फ़िल्म 'गमन' (Gaman) में नाना को एक छोटा सा रोल दिया। यह नाना का बॉलीवुड डेब्यू था। इसके बाद उन्होंने मराठी फ़िल्मों যেমন 'माफीचा साक्षीदार' और कई हिंदी फ़िल्मों में छोटे-मोटे चरित्र किरदार निभाए।
1986 में आई एन. चंद्रा की फ़िल्म 'अंकुश' नाना के करियर का पहला बड़ा मोड़ साबित हुई। इसमें बेरोज़गार, भटके हुए और व्यवस्था से नाराज़ युवक के किरदार में नाना का गुस्सा पर्दे पर ऐसा फूटा कि हिंदी सिनेमा के समीक्षक हैरान रह गए।
बॉलीवुड में धूम: 'परिंदा' से 'क्रांतिवीर' तक का सुनहरा दौर
1989 में विधु विनोद चोपड़ा की फ़िल्म 'परिंदा' रिलीज़ हुई। इस फ़िल्म में नाना ने अंडरवर्ल्ड डॉन 'अन्ना सेठ' का किरदार निभाया। फ़िल्म के क्लाइमेक्स में आग से डरने वाले साइकोपैथ डॉन की भूमिका में उनके अभिनय ने इतिहास रच दिया। इस किरदार के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (National Film Award) और फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला।
इसके बाद नाना ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा:
प्रहार: द फाइनल अटैक (1991): नाना ने न केवल इस फ़िल्म का निर्देशन किया बल्कि 'मेजर चौहान' के रूप में एक सख्त सैन्य अफ़सर का यादगार किरदार भी निभाया। इस रोल की तैयारी के लिए नाना ने मराठा लाइट इन्फैंट्री के साथ महीनों तक वास्तविक कमांडो ट्रेनिंग ली थी।
अंगार (1992): इस क्राइम-ड्रामा फ़िल्म में विलेन की भूमिका निभाकर उन्होंने सर्वश्रेष्ठ खलनायक का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड जीता।
तिरंगा (1993): राजकुमार के साथ उनकी जोड़ी और इंस्पेक्टर शिवाजीराव वागले का बिंदास अंदाज़ बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुआ।
क्रांतिवीर (1994): यह नाना पाटेकर के करियर की सबसे बड़ी मास्टरपीस फ़िल्म मानी जाती है। फ़िल्म का डायलॉग "ये मुसलमान का खून, ये हिन्दू का खून... बता इसमें मुसलमान का कौन सा, हिन्दू का कौन सा?" आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली दृश्यों में गिना जाता है। इस फ़िल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड मिला।
किरदारों का विस्तार: संवेदनशीलता और कॉमेडी का संगम
नाना पाटेकर को शुरुआत में केवल गुस्सैल और आक्रामक भूमिकाओं के लिए जाना जाता था, लेकिन उन्होंने हर शैली में अपनी बहुमुखी प्रतिभा साबित की:
सहानुभूति और गहराई: संजय लीला भंसाली की डेब्यू फ़िल्म 'खामोशी: द म्यूज़िकल' (1996) में नाना ने एक मूक और बधिर (Deaf & Mute) पिता की भूमिका निभाई, जिसमें बिना एक भी शब्द बोले उन्होंने केवल आँखों और हाथों के इशारों से दर्शकों को रुला दिया।
गंभीर थ्रिलर: राम गोपाल वर्मा की 'अब तक छप्पन' (2004) में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट इंस्पेक्टर साधु अगाशे के किरदार में उन्होंने वास्तविक पुलिसिया कार्यप्रणाली को संयम के साथ पर्दे पर उतारा। प्रकाश झा की 'अपहरण' (2005) में बाहुबली राजनेता तबरेज़ आलम के रूप में उन्होंने एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार जीता।
कॉमेडी का जादू: अनीस बज़्मी की 'वेलकम' (2007) और 'वेलकम बैक' (2015) में डॉन 'उदय शेट्टी' बनकर नाना ने दर्शकों को हँसी से लोटपोट कर दिया। डायलॉग "मेरी एक टांग नकली है, मैं हॉकी का बहुत बड़ा खिलाड़ी था..." और "नियंत्रण उदय, नियंत्रण!" आज भी सोशल मीडिया मीम्स की दुनिया में छाए रहते हैं।
मराठी सिनेमा का शिखर: 2016 में आई महेश मांजरेकर की मराठी फ़िल्म 'नटसम्राट' में गणपतराव बेलवलकर के किरदार में नाना के अभिनय को भारतीय सिनेमा के सर्वकालिक महानतम प्रदर्शनों में से एक माना गया।
फ़िल्मफ़ेयर का अनूठा रिकॉर्ड (Unique Cinematic Record)
नाना पाटेकर भारतीय सिनेमा के एकमात्र ऐसे अभिनेता हैं जिन्होंने फ़िल्मफ़ेयर के तीनों प्रमुख अभिनय श्रेणियों में पुरस्कार जीते हैं:
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (Best Actor): क्रांतिवीर (1994)
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (Best Supporting Actor): परिंदा (1989)
सर्वश्रेष्ठ खलनायक (Best Villain / Negative Role): अंगार (1992) और अपहरण (2005)
यह रिकॉर्ड आज तक किसी अन्य बॉलीवुड अभिनेता के नाम नहीं है।
व्यक्तिगत जीवन: सादगी, परिवार और सेना प्रेम
अरबों की फ़िल्म इंडस्ट्री में रहने के बावजूद नाना पाटेकर की जीवनशैली किसी संन्यासी जैसी सरल है। वे मुंबई के 1BHK अपार्टमेंट में अपनी माँ के साथ रहते थे। उन्हें न तो महँगी गाड़ियों का शौक है और न ही वीआईपी पार्टियों का।
विवाह: नाना का विवाह रंगमंच के दिनों में नीलकंठी पाटेकर से हुआ था, जो बैंक में कार्यरत थीं। दोनों का एक बेटा है—मल्हार पाटेकर, जो निर्देशन और प्रोडक्शन में सक्रिय हैं। वैचारिक मतभेदों के चलते दोनों ने अलग रहने का फैसला किया, लेकिन उन्होंने कभी कानूनी तलाक नहीं लिया और आज भी एक-दूसरे का पूरा सम्मान करते हैं।
भारतीय सेना से जुड़ाव: 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान नाना पाटेकर ने वास्तविक मोर्चे पर जाकर भारतीय जवानों के साथ समय बिताया और उनका मनोबल बढ़ाया। भारतीय प्रादेशिक सेना (Territorial Army) ने उन्हें मानद लेफ्टिनेंट कर्नल (Lieutenant Colonel) की रैंक से सम्मानित किया है। नाना खुद को अभिनेता से पहले देश का सच्चा सिपाही मानते हैं।
'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation): किसानों के सच्चे मसीहा
नाना पाटेकर की जिंदगी का सबसे बड़ा और गौरवशाली पहलू उनकी समाज सेवा है। 2015 में महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र में भीषण सूखे के कारण जब सैकड़ों किसान कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना पाटेकर से किसानों का दर्द देखा नहीं गया।
उन्होंने प्रसिद्ध मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' (Naam Foundation) की स्थापना की।
नाना ने अपनी व्यक्तिगत कमाई से करोड़ों रुपये सूखा पीड़ित किसान परिवारों को बांटे।
नाम फाउंडेशन ने केवल पैसे बांटने के बजाय जल संरक्षण पर काम किया—नदियों और नालों को गहरा करना, चेक डैम बनाना, किसानों की विधवाओं को सिलाई मशीन व स्वरोजगार देना और बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना।
नाना अक्सर खुद फावड़ा उठाकर गांवों में पानी के संरक्षण के लिए श्रमदान करते दिखाई देते हैं।
प्रमुख पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Honors)
पद्म श्री (2013): कला और सिनेमा में उत्कृष्ट योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान।
राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (National Film Awards):
1990: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता – परिंदा
1995: सर्वश्रेष्ठ अभिनेता – क्रांतिवीर
1997: सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता – अग्नि साक्षी
फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार (Filmfare Awards):
1990: बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर (परिंदा)
1993: बेस्ट विलेन (अंगार)
1995: बेस्ट एक्टर (क्रांतिवीर)
2006: बेस्ट विलेन (अपहरण)
2017: फ़िल्मफ़ेयर मराठी बेस्ट एक्टर (नटसम्राट)
नाना पाटेकर से जुड़े रोचक तथ्य (Interesting Facts)
उत्कृष्ट रसोइया (Master Chef): नाना पाटेकर को खाना बनाने का बहुत शौक है। फ़िल्मों के सेट पर वे अक्सर पूरी यूनिट और अपने सह-कलाकारों के लिए अपने हाथों से पारंपरिक महाराष्ट्रीयन और कोंकणी खाना बनाते हैं।
राइफल शूटिंग चैंपियन: नाना पाटेकर एक प्रोफेशनल राइफल शूटर हैं और उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में भाग लेकर पदक भी जीते हैं।
गंभीर झुलसने की घटना: 'परिंदा' फ़िल्म के क्लाइमेक्स सीन की शूटिंग के दौरान आग बेकाबू हो गई थी, जिसमें नाना पाटेकर बुरी तरह झुलस गए थे और उन्हें ठीक होने में लगभग एक साल का समय लगा था।
विज्ञापन न करने का सिद्धांत: अपने शुरुआती 40 साल के करियर में उन्होंने कभी किसी व्यावसायिक विज्ञापन (Commercial Ad) में काम नहीं किया, क्योंकि उनका मानना था कि वे केवल एक अभिनेता हैं, सेल्समैन नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. नाना पाटेकर का असली नाम क्या है?
Ans. नाना पाटेकर का वास्तविक नाम विश्वनाथ दिनकर पाटेकर है।
Q2. नाना पाटेकर की पहली बॉलीवुड फ़िल्म कौन सी थी?
Ans. नाना पाटेकर ने 1978 में निर्देशक मुजफ्फर अली की फ़िल्म 'गमन' से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की थी।
Q3. नाम फाउंडेशन क्या है और इसे किसने शुरू किया?
Ans. नाम फाउंडेशन एक गैर-सरकारी संगठन (NGO) है, जिसकी स्थापना 2015 में अभिनेता नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे ने की थी। यह संस्था महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित किसानों और उनके परिवारों के पुनर्वास व जल संरक्षण के लिए काम करती है।
Q4. क्या नाना पाटेकर सेना में रहे हैं?
Ans. जी हाँ, नाना पाटेकर ने 'प्रहार' फ़िल्म के दौरान वास्तविक सैन्य ट्रेनिंग ली थी और 1999 के कारगिल युद्ध में जवानों के साथ रहे थे। भारतीय प्रादेशिक सेना (Territorial Army) ने उन्हें मानद लेफ्टिनेंट कर्नल की उपाधि दी है।
Siddharth Malhotra full biography
Yashasvi Jaiswal full biography
निष्कर्ष (Conclusion)
नाना पाटेकर का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि इंसान की पहचान उसके चेहरे, अमीरी या पारिवारिक रसूख से नहीं, बल्कि उसके कर्म, समर्पण और सादगी से बनती है। एक समय फुटपाथ पर पोस्टर चिपकाने वाला लड़का जब राष्ट्रीय पुरस्कारों की हैट्रिक बनाता है और करोड़ों कमाने के बाद भी किसानों के आंसुओं को पोंछने के लिए अपनी तिजोरी खोल देता है, तब वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहता—वह एक सच्चा जननायक बन जाता है। नाना पाटेकर का जीवन हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों से लड़कर अपना मुकाम हासिल करना चाहता है।
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
लोकप्रिय पोस्ट
आर्यन केल्विन का जीवन परिचय: Aaryan Kelvin Biography in Hindi, असली नाम, उम्र, इंस्टाग्राम रील्स, नेट वर्थ और सफलता की कहानी
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें